चीर हरण
हेडली मामले में अमेरिका ने भारत को जिस परकार टका-सा जवाब दिया है उससे तो लगता है कि भारत रूपी द्रोपदी का 'चीर हरण' कोई भी आसानी से कर सकता है, क्योंकि यहाँ विरोध करने वाला कोई 'मर्द' नहीं है।
२६/११ हमले के आरोपी डेविड हेडली को शनिवार १९ मार्च २०१० को शिकागो की कोर्ट में पेश किया गया। लश्कर-ऐ-तैयबा और cia के एजेंट हेडली को अमेरिका ने भारत को न सोंपे जाने और उसे मौत की सजा न दिए जाने का निर्णय करके न केवल आतंक और आतंकी से समझोता किया है, बल्कि देश-दुनिया के सामने अपना दोगला चेहरा भी दिखा दिया है। अति तो तब हो गई जब अमेरिका के इस रवये के बावजूद भारत के शर्महीन नेता 'अपनी द्रोपदी' का 'चीर हरण' होते देखते रहे। उनकी नींद तब टूटी जब मीडिया ने इस मुद्दे को चेनेल पर दिखाना शुरू किया। इसके बावजूद गृह मंत्रालय से केवल यह बयान आना कि 'अमेरिकी कानून में दखल नहीं करेंगे' , तो केवल भारत और उसके नेताओं की कमजोरी को ही दर्शाता है। महाभारत में द्रोपदी चीर हरण के समय तो पांडवों की मजबूरी समझ में आती है, क्योंकि वे मर्यादा में बंधे हुए थे, लेकिन आज के इन शर्म बेच चुके नेताओं के आड़े कौन सी मर्यादा आ रही है। ये कौन सी बात हुई कि अमेरिका इनके घर में घुसकर इनकी बहन-बेटी की इज्जत उतार ले और ये कहें कि हम उनके कानून में दखल नहीं करेंगें। जब हेडली ने आतंक का षड़यंत्र रचकर भारत की निर्दोष जनता और नोजवानो को मरने का काम किया था तो तब उसने भारत में घुसकर यहाँ के कानून में दखल नहीं दिया था?
नेताओं का यह रवैया २६ नवम्बर को हुए हमले में अपनी जान गवां देने वाले करकरे, विजय सालसकर जैसे अनेक वीरों की शहादत को भी जाया करने वाला है। भारत के नेता भले ही अमेरिका के इस फैसले के विरुद्ध कोई कारवाई न करें, लेकिन १०० करोड की आबादी अब जागने के कगार पर है। जो न केवल अमेरिका के कानून में दखल करेगा, बल्कि उसका भी चीर हरण कर मुहं तोड़ जवाब देगा।
यदि भारत के नेताओं को खुद को बचाना है तो अब न केवल उन्हें जाग जाना होगा, बल्कि १०० करोड़ जनता का सेवक बनकर उसकी रक्षा भी करनी होगी। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब यह जनता जाग जायगी और फिर उसके कहर से ये नेता खुद को नहीं बचा पाएंगे।