सुबह की सैर
वो सुबह की सैर, वो सूर्योदय, वो ताज़ी हवा
बहुत साल बाद ये सब कुछ देखने को मिला
समय ही नहीं मिला
कैसे १०-१२ साल बीत गए अखबार की नौकरी में
पता ही नहीं चला.....
अतीत के बारे में सोचता
सुबह का आनंद लेता
सड़क पर चला जा रहा था
खाबों में खोया
अचानक,
सड़क किनारे एक पेड़ दिखाई दिया
जो बुड्डा हो चला था, सूख रहा था
मेरे कदम,
कुछ देर ठहरे, पेड़ की तरफ खींचा चला गया
फिर पेड़ से आवाज़ आई...
मैंने थोड़ी हमदर्दी जताई,
पेड़ ने अपनी आपबीती बताई ....
"मैं कभी जवान था, लोगों का सहारा था
इसी रास्ते से अनेक लोग गुजरते थे
तब कड़ी धुप में बच्चे, जवान, बूड़े, औरत सभी
मेरी छाया में बैठकर आनंद महसूस करते थे
बच्चे, वो तो सारा दिन यह्नी बैठकर बिता देते थे
खेलते थे, मेरे ऊपर चढ़ कर धींगा मस्ती करते थे
मेरी टहनिया तोड़ देते थे
मैं, दर्द से तड़प उठता था, मगर
उनकी इन शरारत को देख कर मुस्कुराता रहता था
आज उन्ही बच्चों को यहाँ से गुजरता देखता हूँ
मन ख़ुशी से भर उठता है
वे उम्र के एक पड़ाव को पार कर चुके हैं
वे अपने बीवी-बच्चों के साथ यहाँ से गुजरते हैं
मुझे अच्छा लगता है, ये देखकर- वो खुश हैं
थोडा दुःख भी होता है, क्योंकि
जो मेरी गोद में खेल कूद कर बड़े हुए
आज वो मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं
जैसे जानते ही न हों
आज मैं सूख चूका हूँ
मरणासन्न हूँ
मुझे सहारे की जरूरत है
मुझे उम्मीद होती है की कोई रुके
पहले की तरह
सुने मेरे दिल की बात
ताकि
हल्का हो मेरा मन
इस अंतिम समय में मुझे
और कोई इच्छा नहीं
बस कोई पल दो पल के लिए रुके
तुम्हारी तरह
मेरी बात सुने
मुझे लगे की कोई है
मेरा अपना
मेरे इस अंतिम समय में....
जीतेंदर जीत
धन्यवाद
साथियो मेरी ये कविता कैसी लगी
जरूर बताना
यह, केवल कविता नहीं है, बल्कि
मैं इसके जरिये ये सन्देश देना चाहता हूँ
की आज बुजुर्गों को हमारी कितनी जरूरत है
उन्हें हमारा केवल प्यार भरा बोल चाहिए।
तो इसी उम्मीद के सहारे की आप सभी बुजुर्गों की इजजत करेंगे
मनोवेग
Wednesday, April 14, 2010
Friday, April 2, 2010
बदलेगी सोच - बदलेगा फैसला
मनोज-बबली।
शायद यह नाम इतिहास के पन्नो में इस तरह दर्ज हो गया है कि प्रेम करने वाले इसे अदब से याद करेंगे। इकीसवीं सदी का एक दशक पार कर चुके हम खाप पंचायतों के हिटलरी फरमानों के कारण आज भी ६० के दशक को पार नहीं कर पायें हैं। हरियाणा में तो खाप पंचायतों का खौफ प्रेमी जोड़ों पार कहर बनकर टूटता था। अब मनोज-बबली मामले में कोर्ट ने जो एतिहासिक फैसला सुनाया, उससे अन्धाधुन्ध तुगलकी फरमान सुनाने वाली पंचायतों का मनोबल अवश्य ही टूटा होगा। भविष्य में पंचायतें ऐसे किसी भी मामले में कठोर फैसला करने से पहले सो बार सोचेंगी और उन्हें ऐसा सोचना भी चाहिए।
क्योंकि :-
- पंचायतों को किसने अधिकार दिया कि वो किसी की मौत का फरमान सुना सकें।
- क्या पंचायतें न्यायपालिका से भी बड़ी हो गई?
- क्या कठोर फैसले सुनाने वाले अपने बच्चों को भी कठोर सजा सुना सकते हैं?
- प्रेम को गलत मानने वाले, जो मौत जैसा फैसला सुनते हैं, उनके बच्चे कितने दूध के धुले होते हैं ये वे भी बखूबी जानते हैं। फिर क्यों वे परदे के पीछे किये अपने बच्चों के उस काम को सही मानते हैं? क्यों नहीं अपने बच्चों या खुद को सजा देते?
- दूसरों के मामले में टांग फंसाने वालों को जरा अपने गिरेंबाअन में झांक कर देखना चाहिए की वे कितने पानी में हैं?
अदालत के इस फैसले से पंचायतें भविष्य में शायद सोच समझ कर फैसला करें। साथ ही यह भी कहना चाहूँगा की प्रेम करने वाले युवाओं को भी इस बारे में सोचना होगा। उन्हें भविष्य के परिणामों के बारे में अपने और अपने परिवार वालों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में अवश्य विचार करना होगा। अपने गाँव, समाज, प्रदेश और देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर करना है तो हम सबको जात-पात, उंच-नीच, भेदभाव आदि से ऊपर उठकर सोचना होगा। तभी हम अपनी और अपने देश की तरक्की कर सकते हैं।
शायद यह नाम इतिहास के पन्नो में इस तरह दर्ज हो गया है कि प्रेम करने वाले इसे अदब से याद करेंगे। इकीसवीं सदी का एक दशक पार कर चुके हम खाप पंचायतों के हिटलरी फरमानों के कारण आज भी ६० के दशक को पार नहीं कर पायें हैं। हरियाणा में तो खाप पंचायतों का खौफ प्रेमी जोड़ों पार कहर बनकर टूटता था। अब मनोज-बबली मामले में कोर्ट ने जो एतिहासिक फैसला सुनाया, उससे अन्धाधुन्ध तुगलकी फरमान सुनाने वाली पंचायतों का मनोबल अवश्य ही टूटा होगा। भविष्य में पंचायतें ऐसे किसी भी मामले में कठोर फैसला करने से पहले सो बार सोचेंगी और उन्हें ऐसा सोचना भी चाहिए।
क्योंकि :-
- पंचायतों को किसने अधिकार दिया कि वो किसी की मौत का फरमान सुना सकें।
- क्या पंचायतें न्यायपालिका से भी बड़ी हो गई?
- क्या कठोर फैसले सुनाने वाले अपने बच्चों को भी कठोर सजा सुना सकते हैं?
- प्रेम को गलत मानने वाले, जो मौत जैसा फैसला सुनते हैं, उनके बच्चे कितने दूध के धुले होते हैं ये वे भी बखूबी जानते हैं। फिर क्यों वे परदे के पीछे किये अपने बच्चों के उस काम को सही मानते हैं? क्यों नहीं अपने बच्चों या खुद को सजा देते?
- दूसरों के मामले में टांग फंसाने वालों को जरा अपने गिरेंबाअन में झांक कर देखना चाहिए की वे कितने पानी में हैं?
अदालत के इस फैसले से पंचायतें भविष्य में शायद सोच समझ कर फैसला करें। साथ ही यह भी कहना चाहूँगा की प्रेम करने वाले युवाओं को भी इस बारे में सोचना होगा। उन्हें भविष्य के परिणामों के बारे में अपने और अपने परिवार वालों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में अवश्य विचार करना होगा। अपने गाँव, समाज, प्रदेश और देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर करना है तो हम सबको जात-पात, उंच-नीच, भेदभाव आदि से ऊपर उठकर सोचना होगा। तभी हम अपनी और अपने देश की तरक्की कर सकते हैं।
Friday, March 19, 2010
चीर हरण
चीर हरण
हेडली मामले में अमेरिका ने भारत को जिस परकार टका-सा जवाब दिया है उससे तो लगता है कि भारत रूपी द्रोपदी का 'चीर हरण' कोई भी आसानी से कर सकता है, क्योंकि यहाँ विरोध करने वाला कोई 'मर्द' नहीं है।
२६/११ हमले के आरोपी डेविड हेडली को शनिवार १९ मार्च २०१० को शिकागो की कोर्ट में पेश किया गया। लश्कर-ऐ-तैयबा और cia के एजेंट हेडली को अमेरिका ने भारत को न सोंपे जाने और उसे मौत की सजा न दिए जाने का निर्णय करके न केवल आतंक और आतंकी से समझोता किया है, बल्कि देश-दुनिया के सामने अपना दोगला चेहरा भी दिखा दिया है। अति तो तब हो गई जब अमेरिका के इस रवये के बावजूद भारत के शर्महीन नेता 'अपनी द्रोपदी' का 'चीर हरण' होते देखते रहे। उनकी नींद तब टूटी जब मीडिया ने इस मुद्दे को चेनेल पर दिखाना शुरू किया। इसके बावजूद गृह मंत्रालय से केवल यह बयान आना कि 'अमेरिकी कानून में दखल नहीं करेंगे' , तो केवल भारत और उसके नेताओं की कमजोरी को ही दर्शाता है। महाभारत में द्रोपदी चीर हरण के समय तो पांडवों की मजबूरी समझ में आती है, क्योंकि वे मर्यादा में बंधे हुए थे, लेकिन आज के इन शर्म बेच चुके नेताओं के आड़े कौन सी मर्यादा आ रही है। ये कौन सी बात हुई कि अमेरिका इनके घर में घुसकर इनकी बहन-बेटी की इज्जत उतार ले और ये कहें कि हम उनके कानून में दखल नहीं करेंगें। जब हेडली ने आतंक का षड़यंत्र रचकर भारत की निर्दोष जनता और नोजवानो को मरने का काम किया था तो तब उसने भारत में घुसकर यहाँ के कानून में दखल नहीं दिया था?
नेताओं का यह रवैया २६ नवम्बर को हुए हमले में अपनी जान गवां देने वाले करकरे, विजय सालसकर जैसे अनेक वीरों की शहादत को भी जाया करने वाला है। भारत के नेता भले ही अमेरिका के इस फैसले के विरुद्ध कोई कारवाई न करें, लेकिन १०० करोड की आबादी अब जागने के कगार पर है। जो न केवल अमेरिका के कानून में दखल करेगा, बल्कि उसका भी चीर हरण कर मुहं तोड़ जवाब देगा।
यदि भारत के नेताओं को खुद को बचाना है तो अब न केवल उन्हें जाग जाना होगा, बल्कि १०० करोड़ जनता का सेवक बनकर उसकी रक्षा भी करनी होगी। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब यह जनता जाग जायगी और फिर उसके कहर से ये नेता खुद को नहीं बचा पाएंगे।
हेडली मामले में अमेरिका ने भारत को जिस परकार टका-सा जवाब दिया है उससे तो लगता है कि भारत रूपी द्रोपदी का 'चीर हरण' कोई भी आसानी से कर सकता है, क्योंकि यहाँ विरोध करने वाला कोई 'मर्द' नहीं है।
२६/११ हमले के आरोपी डेविड हेडली को शनिवार १९ मार्च २०१० को शिकागो की कोर्ट में पेश किया गया। लश्कर-ऐ-तैयबा और cia के एजेंट हेडली को अमेरिका ने भारत को न सोंपे जाने और उसे मौत की सजा न दिए जाने का निर्णय करके न केवल आतंक और आतंकी से समझोता किया है, बल्कि देश-दुनिया के सामने अपना दोगला चेहरा भी दिखा दिया है। अति तो तब हो गई जब अमेरिका के इस रवये के बावजूद भारत के शर्महीन नेता 'अपनी द्रोपदी' का 'चीर हरण' होते देखते रहे। उनकी नींद तब टूटी जब मीडिया ने इस मुद्दे को चेनेल पर दिखाना शुरू किया। इसके बावजूद गृह मंत्रालय से केवल यह बयान आना कि 'अमेरिकी कानून में दखल नहीं करेंगे' , तो केवल भारत और उसके नेताओं की कमजोरी को ही दर्शाता है। महाभारत में द्रोपदी चीर हरण के समय तो पांडवों की मजबूरी समझ में आती है, क्योंकि वे मर्यादा में बंधे हुए थे, लेकिन आज के इन शर्म बेच चुके नेताओं के आड़े कौन सी मर्यादा आ रही है। ये कौन सी बात हुई कि अमेरिका इनके घर में घुसकर इनकी बहन-बेटी की इज्जत उतार ले और ये कहें कि हम उनके कानून में दखल नहीं करेंगें। जब हेडली ने आतंक का षड़यंत्र रचकर भारत की निर्दोष जनता और नोजवानो को मरने का काम किया था तो तब उसने भारत में घुसकर यहाँ के कानून में दखल नहीं दिया था?
नेताओं का यह रवैया २६ नवम्बर को हुए हमले में अपनी जान गवां देने वाले करकरे, विजय सालसकर जैसे अनेक वीरों की शहादत को भी जाया करने वाला है। भारत के नेता भले ही अमेरिका के इस फैसले के विरुद्ध कोई कारवाई न करें, लेकिन १०० करोड की आबादी अब जागने के कगार पर है। जो न केवल अमेरिका के कानून में दखल करेगा, बल्कि उसका भी चीर हरण कर मुहं तोड़ जवाब देगा।
यदि भारत के नेताओं को खुद को बचाना है तो अब न केवल उन्हें जाग जाना होगा, बल्कि १०० करोड़ जनता का सेवक बनकर उसकी रक्षा भी करनी होगी। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब यह जनता जाग जायगी और फिर उसके कहर से ये नेता खुद को नहीं बचा पाएंगे।
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