मनोज-बबली।
शायद यह नाम इतिहास के पन्नो में इस तरह दर्ज हो गया है कि प्रेम करने वाले इसे अदब से याद करेंगे। इकीसवीं सदी का एक दशक पार कर चुके हम खाप पंचायतों के हिटलरी फरमानों के कारण आज भी ६० के दशक को पार नहीं कर पायें हैं। हरियाणा में तो खाप पंचायतों का खौफ प्रेमी जोड़ों पार कहर बनकर टूटता था। अब मनोज-बबली मामले में कोर्ट ने जो एतिहासिक फैसला सुनाया, उससे अन्धाधुन्ध तुगलकी फरमान सुनाने वाली पंचायतों का मनोबल अवश्य ही टूटा होगा। भविष्य में पंचायतें ऐसे किसी भी मामले में कठोर फैसला करने से पहले सो बार सोचेंगी और उन्हें ऐसा सोचना भी चाहिए।
क्योंकि :-
- पंचायतों को किसने अधिकार दिया कि वो किसी की मौत का फरमान सुना सकें।
- क्या पंचायतें न्यायपालिका से भी बड़ी हो गई?
- क्या कठोर फैसले सुनाने वाले अपने बच्चों को भी कठोर सजा सुना सकते हैं?
- प्रेम को गलत मानने वाले, जो मौत जैसा फैसला सुनते हैं, उनके बच्चे कितने दूध के धुले होते हैं ये वे भी बखूबी जानते हैं। फिर क्यों वे परदे के पीछे किये अपने बच्चों के उस काम को सही मानते हैं? क्यों नहीं अपने बच्चों या खुद को सजा देते?
- दूसरों के मामले में टांग फंसाने वालों को जरा अपने गिरेंबाअन में झांक कर देखना चाहिए की वे कितने पानी में हैं?
अदालत के इस फैसले से पंचायतें भविष्य में शायद सोच समझ कर फैसला करें। साथ ही यह भी कहना चाहूँगा की प्रेम करने वाले युवाओं को भी इस बारे में सोचना होगा। उन्हें भविष्य के परिणामों के बारे में अपने और अपने परिवार वालों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में अवश्य विचार करना होगा। अपने गाँव, समाज, प्रदेश और देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर करना है तो हम सबको जात-पात, उंच-नीच, भेदभाव आदि से ऊपर उठकर सोचना होगा। तभी हम अपनी और अपने देश की तरक्की कर सकते हैं।
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